खंडवा/खरगोन/बुरहानपुर/बड़वानी। श्राद्ध पक्ष शुरू होते ही निमाड़ अंचल में पारंपरिक संजा लोकपर्व की शुरुआत हो गई है। खरगोन, खंडवा, बुरहानपुर और बड़वानी सहित निमाड़ के ग्रामीण क्षेत्रों में घरों की दीवारों और मुख्य द्वारों पर गोबर, मिट्टी, फूल-पत्तियों और रंगीन सजावटी सामग्री से संजा की आकृतियां बनाई जाने लगी हैं। शाम के समय बालिकाओं और महिलाओं के पारंपरिक निमाड़ी गीतों से गांवों का वातावरण लोक संस्कृति के रंग में रंगने लगा है।
क्या है निमाड़ का संजा पर्व?
संजा पर्व निमाड़ की प्रमुख लोक परंपराओं में शामिल है। इसे मुख्य रूप से पितृ पक्ष के दौरान कुंवारी कन्याओं द्वारा मनाया जाता है। लोकमान्यताओं में संजा माता को देवी पार्वती के स्वरूप से जोड़ा जाता है। इस दौरान कन्याएं अच्छे वर, सुखी वैवाहिक जीवन और परिवार की मंगलकामना के लिए संजा माता की पूजा-अर्चना करती हैं।
संजा पर्व केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा आयोजन नहीं है, बल्कि यह निमाड़ी लोककला, लोकगीत, सामूहिक सहभागिता और पारंपरिक सामाजिक मेल-जोल का भी महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है।
16 दिनों तक चलती है संजा की परंपरा
परंपरागत रूप से संजा पर्व भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक मनाया जाता है। इन दिनों में प्रतिदिन संजा माता की अलग-अलग आकृतियां बनाई जाती हैं।
गोबर और मिट्टी से तैयार आधार पर फूलों की पंखुड़ियों, पत्तियों तथा रंग-बिरंगी सजावटी सामग्री का उपयोग करके दीवारों को सजाया जाता है। अलग-अलग दिनों में लोकपरंपरा के अनुसार विभिन्न आकृतियां बनाई जाती हैं।
इनमें चौपड़/पांस, गाड़ी, स्वास्तिक, चांद-सूरज, हाथी-घोड़े जैसी आकृतियां प्रमुख रूप से देखने को मिलती हैं। पर्व के अंतिम चरण में बनाया जाने वाला ‘किलाकोट’ विशेष आकर्षण का केंद्र रहता है।
शाम होते ही गूंजते हैं संजा के लोकगीत
संजा पर्व की सबसे खास पहचान इसके पारंपरिक लोकगीत हैं। शाम के समय बालिकाएं और सहेलियां संजा माता की आकृति के सामने एकत्र होती हैं। पूजा-अर्चना और आरती के बाद पारंपरिक निमाड़ी गीत गाए जाते हैं।
इसी दौरान संजा से जुड़े पारंपरिक गीतों की पंक्तियां गांवों में सुनाई देने लगती हैं—
“संजा बाई का लाड़ा जी लुगड़ा लाया…”
लोकगीतों के माध्यम से संजा की कथा, पारिवारिक संबंधों, लोकजीवन और ग्रामीण संस्कृति की झलक भी देखने को मिलती है।
प्रसाद और सामूहिक मेल-जोल की परंपरा
संजा पर्व में पूजा के बाद प्रसाद बांटने की भी परंपरा है। बालिकाएं और महिलाएं सामूहिक रूप से पूजा में शामिल होती हैं तथा प्रसाद का आदान-प्रदान करती हैं। इस तरह यह पर्व परिवार और पड़ोस के लोगों को जोड़ने के साथ-साथ ग्रामीण समाज में आपसी मेल-जोल को भी मजबूत करता है।
अंतिम दिन बनता है ‘किलाकोट’
संजा पर्व के अंतिम दिनों में बनाई जाने वाली आकृतियों में किलाकोट का विशेष महत्व है। इसे लोककला और रचनात्मकता का बड़ा उदाहरण माना जाता है। इसके निर्माण में बालिकाओं की कल्पनाशीलता और पारंपरिक कला-कौशल दिखाई देता है।
अमावस्या के दिन संजा माता की पूजा-अर्चना के बाद परंपरा के अनुसार उन्हें विदाई दी जाती है। कुछ क्षेत्रों में संजा की सामग्री को जलाशय में विसर्जित करने की परंपरा भी रही है।
निमाड़ की लोकसंस्कृति को जीवित रखने वाला पर्व
संजा पर्व की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें धर्म, लोककला, लोकगीत और सामाजिक सहभागिता एक साथ दिखाई देते हैं। आधुनिक समय में बदलती जीवनशैली के बावजूद ग्रामीण निमाड़ में इस परंपरा का जारी रहना स्थानीय लोकसंस्कृति की निरंतरता को दर्शाता है।
खंडवा, खरगोन, बुरहानपुर और बड़वानी सहित निमाड़ के अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में संजा पर्व के दौरान घरों की दीवारों पर बनने वाली आकृतियां और शाम को गूंजते लोकगीत इस क्षेत्र की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को सामने लाते हैं।
संजा पर्व : एक नजर में
- क्षेत्र: निमाड़ अंचल — खरगोन, खंडवा, बुरहानपुर और बड़वानी सहित आसपास के क्षेत्र
- समय: पितृ पक्ष
- अवधि: परंपरागत रूप से 16 दिन
- मुख्य प्रतिभागी: कुंवारी बालिकाएं और महिलाएं
- मुख्य कला: गोबर, मिट्टी, फूल-पत्तियों और सजावटी सामग्री से आकृतियां
- प्रमुख आकृतियां: पांस/चौपड़, गाड़ी, स्वास्तिक, चांद-सूरज, हाथी-घोड़े
- विशेष आकर्षण: अंतिम चरण का ‘किलाकोट’
- मुख्य गतिविधियां: पूजा, आरती, निमाड़ी लोकगीत और प्रसाद वितरण
- सांस्कृतिक महत्व: लोककला, लोकगीत और सामुदायिक परंपरा का संरक्षण
निमाड़ में संजा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही ऐसी लोकपरंपरा है जिसमें दीवारों पर बनी आकृतियों, गीतों और सामूहिक पूजा के माध्यम से क्षेत्र की सांस्कृतिक स्मृति आज भी जीवित दिखाई देती है।
